Thursday, October 8, 2009
स्वंम को ढूढता
अपने अन्तर में झाँक कर,
अनंत को ढूंढता हूँ।
अनंत में अनहद को ढूँढता हूँ
अन्तर में स्वंम स्वरूप को ढूँढता हूँ
पर कहीं कुछ भी नही ढूंढ पाता हूँ
अनंत में निहार कर
अन्धकार को पाता हूँ ।
अन्धकार से निकल कर ,
उज्जवल- दिव्य प्रकाश को ढूँढता हूँ
पर कहीं कुछ भी नहीं ढूंढ पाता हूँ
क्योंकि स्वंम को ही ढूँढता स्वंम से ही दूर हूँ।
Monday, October 5, 2009
प्रेम से प्रभु की प्राप्ति
पवित्र, निःस्वार्थ और निश्छल प्रेम से जगत के लोग और जगत के नियंता को जीता जा सकता है। प्यार, श्रद्धा और सेवा से प्रभु की कृपा होगी और प्रभु का सबसे प्यारा बना जा सकता है । प्रेम और प्यार जितना बाँटोगे उतना ही प्रभु के करीब पहुँचोगे । प्रभु के बनाये हुए समस्त प्राणियो को प्रेम की पुष्पांजलि अर्पित करें , प्रभु तो प्यार का भूखा है। जहाँ निश्छल और निःस्वार्थ प्रेम की भावना होगी वहीं प्रभु का निवास होता है । प्रेम की साधना ही सर्वोत्तम उपासना है । परिवारिक प्रेम, सामाजिक प्रेम, सांसारिक प्रेम हों अवस्य पर निःस्वार्थ हों । प्रेम का विस्तार करें और इसकी शुरुआत अपने ही घर से ही करें, फिर संबधियों से , फिर समाज से, फिर प्रदेश से, फिर देश से और अंत में सारे जहाँ तक विस्तार करें । प्रेम रस का विस्तार ही प्रभु के पास पहुँचने का सरल और सहज मार्ग है।
