Friday, September 25, 2015

अच्छी वाणी 001

केवल सद्गुरु का ध्यान और नाम की कमाई ही इस कलयुग में जीव का उद्धार करा सकती है।

ईश्वर और संत सद्गुरु हमारे अंग संग है। हमेशा वे हमारा ख्याल रखतें है और सम्भल भी करतें है।

दुःख का आना जाना लगा ही रहेगा पर सैम और स्थिर चित्त व्यक्ति सदा ही सुखी रहता है।

समस्त जीव के साथ प्यार सहिष्णुता दया करुणा क्षमा सहज
प्रेम पूर्ण व्यवहार करना चाहिए।


अपने को मालिक के हवाले सौप दो।

जो ज्यादा मान सम्मान चाहतें है वे बड़ी जल्दी ही अपमानित हो जातें है। उनका अहं गुब्बारे की तरह फुला होता है और हर समय उसमें पिन चुभने का डर लगा रहता है।

चाह गई चिंता गई मनुवा बेपरवाह
जिस को कछु न चाहिए वो ही शाहंशाह।

ईश्वर को प्राप्ति के लिए आपको एकांत और शांत रहना जरुरी है।

समय थोड़ा है मंजिल दूर है, जो करना है सो आज और अभी करना है।

जीओं जरुरत के मुताबिक और हमेशा खुश रहो।

बर्तमान में जीओ और अच्छे से जीओ क्योंकि अगला क्षण तुम्हारा नहीं है।

मृत्यु अवश्यम्भावी है जो सबसे बड़ा सच है इसलिए मृत्यु से डरो और अच्छे कर्म किया करो।

स्व को जो ढूंढा तो मुझे स्वामी मिल गया।

जो जैसा है वैसा ही निहारो, उसमे अपने मन से,  विवेक से, बुद्धि से कुछ भी मत जोड़ो।

कष्ट पकड़े रहने में है, छोड़ने की आदत डालो फिर सुख ही सुख है।

मुर्ख लोग इस नश्वर संसार से लगाव रखतें है, और कुछ भी खोने पर उन्हें कष्ट होता है और रोतें भी है पर ज्ञानी जान तो देख देख मंद मन्द मुस्कुराते रहतें  है क्योंकि जानतें है क्या लाया था जो खो दिया। तेरा ही था तुझे मिल गया। फिर क्यों रोना।

सच्चा मार्ग वही है जो जीते जी मुक्ति दिला दे क्योंकि मरने के बाद की मुक्ति का बात एक छलावा है।

जीते जी मरने की विधि सीखिये और भाव जाल पार कर जाइए।

रुहानियत की ओर

कोमल, शुद्ध और  निर्मल आचरण वाला तथा जो सदाचारिता पूर्वक जीवन जीता है वाही रूहानियत की ओर अग्रसर हो सकतें है। 

बदलाव में समय लगता है

बदलाव में समय लगता है अभी तो केवल इंफ्रास्ट्रक्चर ही ठीक हुआ है सड़कें बानी स्कूल का बिल्डिंग दुरुस्त हुआ टीचर आये हॉस्पिटल बना कुछ लोगों को नौकरी मिली। कबीर का कहना है

धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होत
माली सींचत सौ घरा पर ऋतु आये फल होत।।

धैर्य रखिये नितीश को जिताईए क्योंकि

जो इंजीनियर और कार्य करने में सक्षम, कर्मठ, अनुभवी, संयमी, सुलझा हुआ, नपा तुला और कम बोलने वाला, संवेदनशील, सही शारीरिक अभिव्यक्ति वाला, बिना दुसरों के भावनाओं को ठेस पहुँचाये अपनी बात करने वाला  ईमानदार इंसान बिहार के प्रति सजग और समर्पित ब्यक्ति मुझे अगर कोई दीखता है तो वह है नितीश कुमार।

अपने राजनितिक जीवन में पहले करीब ५ साल इस देश के रेल मंत्री  और कुछ साल केंद्रीय मंत्री भी रहे  फिर १० साल बिहार के मुख्य मंत्री के शासन काल में कुछ भी ग़लत करने का आरोप न हो। आज की इस गिरी हुई राजनीति से भरे हुये लोगों के बीच अपने को बेदाग़ रखना, अपने आप में अजूबा है।

आज पढ़ा लिखा ईमानदार राजनीतिज्ञ का मिल ना कठिन है ऐसे बिहार के लिए नितीश कुमार के अलावे मुझे कोई नजर नहीं आता।

दूसरी पार्टियां कितनी भी गाली दे पर कितना भी आरोप प्रत्यारोप लगाये पर सच कहें तो आज के दिन पुरे देश में नीतिश कुमार के जोड़ का कोइ नेता नहीं है।

नितीश कुमार केवल नितीश कुमार को लाना है
नितीश कुमार को जीता कर अगला मुख्य मंत्री बनाना है।

मनचलों व् सिरफिरों पर नजर रखने की जिम्मेवारी

हर मनचलों व् सिरफिरों पर नजर रखने की जिम्मेवारी सिर्फ सरकार की ही नहीं होती। परिवार और समाज की भी होती है। ऐसी घटनाये और किसी प्रदेश में नहीं होती है क्या?
मैं भी इस तरह की घटना की भर्त्सना करता हूँ और दोषी को सजा मिले।
पर ऐसी एकाध घटना को ले कर पुरे तंत्र को वदनाम करना और पुरे प्रदेश को बदनाम करना मुझे ठीक नहीं लगता।
पिछले डेढ महीने से पुरे प्रायोजित तरीके से बिहार को बदनाम करने पे लगें है। यह बिहार की अस्मिता के लिए ठीक नहीं है। खासकर कहने को बड़ी बड़ी पार्टी के नेता लोग तो हद ही कर दी है हर समय निगेटिविटी ही परोसती नजर आ रही है। ऐसे में क्या इनको वोट मिल पायेगा। संदेह है।
घर में गलती हो या बेटे गलती करतें है उन्हें कोसतें नहीं उसे हीन भावना से निकलना होता है। पर बिहार के लिए तो कहानी ही अलग हो जाती है। पाजिटिविटी दिखाई ही नहीं देती।
भाई बिहार तो ऐसे ही बदनाम था पीछे कुछ समय में जो भी सुधार हुआ व् बदनामी से निकल पाया उसे भी खत्म कर दिया।
फिर आगे कोई कंपनी क्या बिहार में निवेश कर पाएगी???
आपके हिसाब से बिहार कैसा होगा इस विजन के साथ बिहार में तरक्की के लिये  आप कैसा उपाय करेंगे इसके साथ प्रचार करने से वोटर वोट भी देने को उत्सुक होगा।

Corporate Agriculture is the best for India

Corporate Agriculture is the best for India

भारत जैसे विशाल  देश में  जहाँ  80 % लोग गाँव में बसतें हैं और भारत कृषि प्रधान देश है। ऐसे में स्वभाविक है ज्यादा से ज्यादा लोग गाँव में ही बेरोजगार होंगे। फिर जैसे जैसे आवादी बढ़ती जा रही है वैसे वैसे अनाजो की भी उत्पादन बढाना पड़ेगा।

अगर हमारी सरकार कॉर्पोरेट खेती करने को प्रश्रय दे , जिसमे सभी आधुनिक तरीके से खेती हो। किसी अच्छी कंपनी के  द्वारा कराया जाये जिसमे गांव के मजदुर व् किसान भाइयो की सहभागिता हो और उनके श्रम के एवज में उनको मासिक वेतन निर्धारित किया जाये तथा जमींन के एवज में उन्हें अन्न मुहैया  किया जाय।

अभी हमारे देश में  दलहन तथा तेलहन की  जो कमी हो गई है  उससे  ही निजात मिल सकती है।

ऐसा करने से गाँव के युवक, मजदुर एवं किसान भाई को रोजगार भी मिलेगा साथ ही भारत  में बिभिन्न प्रकार के अनाज के उत्पादन में भी मील का पत्थर साबित होगा।

यह गाँव को आदर्श गाँव बनाने में भी सहयोग करेगा साथ ही बेरोजगारी एवम् अनाज उत्पादन में भी।

जनसंख्या रिपोर्ट 2011 के अनुसार भारत में पारिवारिक स्थिति पर समीक्षा

जनसंख्या रिपोर्ट 2011 के अनुसार

"देश के लगभग 76 % परिवार की औसत मासिक आय 5000 ₹  है।"

इसका अर्थ यह हुआ कि इस महँगाई के समय में उनकी दयनीय हालात कैसी होगी कल्पना नहीं की जा सकती। मेरा मन ब्यथित हो उठा। और सोंचने लगा क्या ऐसा अपनी केंद्रीय सरकार कर सकती है।

देश आर्थिक संम्पन्नता के लिए यह सुनिश्चित करनी चाहिए कि ऐसे चिन्हित परिवार के दो सदस्यों को उनकी योग्यता के अनुसार समुचित रोजगार की ब्यवस्था की जाय। इसमें सभी प्रकार के सरकारी, अर्ध सरकारी, बैंकिंग सेक्टर व् सभी प्रकार के प्राइवेट कंम्पनी में कुछ ट्रेनिंग दे कर समायोजित किया जा सकता है।

ऐसे भी सभी कंपनी शुरू में स्किल और कार्य से सम्बन्धित ट्रेनिंग तो देतें ही है।

अगर ऐसा हो जाता है तो बिना किसी सरकारी ब्यय के ही पुरे भारत के 76 %परिवार की मासिक आय 20 से 30 हजार रुपये तो हो ही जायेगी।

अगर सरकार यह सोंच ले कि भारत का सभी गांवों को आदर्श गाँव बनाने का संकल्प ले और प्रोजेक्ट शुरू कर दे। इससे स्थानीय लोगों को तो रोजगार  मिलेगा ही साथ ही आगे भी रख रखाव के लिए लोगो को स्थाई तौर पर समायोजित किया जा सकता है।

इससे एक ही खर्चे  में दो काम संभव हो सकेगा।


मनु वादी व्यवस्था वाले लोग

मनु वादी व्यवस्था वाले लोग कोई आकड़ा या कोई तथ्य मानने को तैयार नही होंगे। ये लोग जो मर्जी होती है कहतें है और करते हैं कोई संबिधान नही कोई कोर्ट नहीं कोई नियम नहीं उनके लिए। सब नियम हम पिछड़े दलितों के लिए होते हैं। न उनकी सोंच बदली है और न ही उनके व्यव्हार ।

उनकी तरफ से पिछड़ों दलितों के लिए गालियां, भेद -भाव, असम्मान, झूठ फरेब बोल कर बड़गलाना, सामाजिक शोषण, आर्थिक शोषण, सामाजिक मान्यता नहीं देना  ही होता आया है । अभी भी यही है भले ही ऊपर से देखार होना न चाह रहैं हो तो ऊपरी तौर पर व्यवहार अलग दीखता हो पर अंदर में तो वही बात रहती है।