Sunday, September 19, 2010
Bhakti - भक्ति
भक्ति व्यक्तिगत समर्पण है, भक्ति भावना का उत्क्रिस्ट स्वरुप है | इश्वर तक जाने के लिए भक्ति भाव का होना आवश्यक है जिसमे निःस्वार्थ समर्पण की आवश्यकता होती है | इश्वर के करीब पहुचने के लिए जमघट, तामझाम और शोर - शराबे की आवश्यकता नहीं होती |
ॐ विवेचन
\विवेचन
अव्यक्त अनादि अनंत अजय, अज आदि मूल परमातम जो |
ध्वनि प्रथम स्फुटित परा धारा, जिनसे कहिये स्फोट है सो ||
है स्फोट वही उदगीथ वही, ब्रह्म नाद शब्द ब्रह्म ॐ वही |
है अति मधुर प्रणव ध्वनि धार वही, है परमातम परतीक वही ||
प्रभु का ध्वन्यात्मक नाम वही, है सार शब्द सतशब्द वही |
है सत चेतन अव्यक्त वही, व्यक्तों में व्यापक नाम वही ||
है सर्वव्यापिनी ध्वनि राम वही, है सर्व कर्षक हरि कृष्ण नाम वही |
है परम प्रचंडिनी शक्ति वही, है शिव शंकर हरि नाम वही ||
पुनि राम नाम है अगुन वही है अकथ अगम पूर्ण काम वही |
स्वर व्यंजन रहित अघोष वही, चेतन ध्वनि सिन्धु अदोष वही ||
है एक ॐ सतनाम वही, है एक ॐ सतनाम वही |
ऋषी सेवित पभु का नाम वही, मुनि सेवित गुरु का नाम वही ||
भजो ॐ ॐ प्रभु नाम वही |
भजो ॐ ॐ प्रभु नाम वही ||
राम नाम अमर नाम भजो भाई सोई
राम नाम अमर नाम भजो भाई सोई |
सोई सतधुन सब घट घट होई ||
परा न पश्यन्ति न मध्यमा न बैखरी |
वर्णात्मक हत धुन नहीं कोई ||
अनहत अनाहत परसावे सत्पद |
पंहुंची जहाँ पुनि भाव नहीं कोई ||
गुरु भेद धरी धरी दिव्य दृष्टि करी करी |
तीन बंद बंद करी भजो नाम सोई ||
मेंहीं धुनी अंतर अंत सुनी |
सूरत रमे गुरु आश्रित होई ||
सोई सतधुन सब घट घट होई ||
परा न पश्यन्ति न मध्यमा न बैखरी |
वर्णात्मक हत धुन नहीं कोई ||
अनहत अनाहत परसावे सत्पद |
पंहुंची जहाँ पुनि भाव नहीं कोई ||
गुरु भेद धरी धरी दिव्य दृष्टि करी करी |
तीन बंद बंद करी भजो नाम सोई ||
मेंहीं धुनी अंतर अंत सुनी |
सूरत रमे गुरु आश्रित होई ||
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