नई सोच को विकसित करने को
प्रकृति ने अपना तांडव दिखाया है।
प्राकृतिक गुण सम्पन्न मानव बनाने को
विध्वंश का रूप कॅरोना बन आया है।
हे प्रभु सब तेरा ही विस्तार है
हे प्रभु सब तेरा ही अधिकार है।
हम सब हैं प्रभु जो तेरी रहमत है
हम सब है प्रभु जब तू सहमत है।
निरीह मानव का संहार मानव ही कर रहे।
एक देश कैसे दूसरे देशों से लड़ रहे।
कोई चाँद पर घर बनाने में लगा
कोई आकाश में ही उड़ने लगा।
कोई मंगल यान बना मंगल गीत गाया
कोई सूर्य को ही बनाने की कल्पना संजोया।
कई ने की सीमा पर बड़ी लड़ाई
बढ़ चढ़ कर करते रहे अपनी बड़ाई।
कहीं धर्म-संस्कृति के लिए की नरसंहार
कही जाती-वर्ण पर हो रहे अत्याचार।
विकास के लिए बहुत हुए आविष्कार
पर प्राकृतिक संपदा को दिया तोड़-मरोड़।
बच्चियों पर हुए अनगिनत बलात्कार
प्रकृति के साथ तुम कर रहे हो छेड़छाड़।
हत्या जीव जंतुओं की कर न सुनी उनकी चीख
चिल्ला चिल्ला मांगते रहे जीवन की भीख।
चोरी सीना-जोरी कर छीना झपटी व डकैती
अपहरण कर देते धमकी व मांगते रहे फिरौती।
चारों ओर हो रही बर्बरता ही बर्बरता
न रही संस्कृति न रही नैतिकता।।
दानव बन बैठे अहंकार से हो लिप्त
करुणा छोड़ हिंसक बन किया कुकृत्य।
जिस मानव को प्रभु ने समृद्ध बनाया
प्रेम प्यार मोहब्बत दे गले भी लगाया।
वही सभी नियमों को करते रहे भंग
दंगे कराये व शांति को कर दिए भंग।
समय है तेरे को घुटने पे लाने का
नफरत फैलाने वाले को दहशत दिखाने का।
प्रकृति का रहमत भी देखा, सहमति भी देखा,
भरपूर सहयोग भी देखा, अब विकृति भी देख।
मानव को सजा मिलेगा विध्वंस का
फिर सृजन होगा नव मानव समाज का।
नई सोच को विकसित करने को
प्राकृतिक गुण सम्पन्न मानव बनाने को
नई प्रवृति नई आकृति नई आवृति देने को।
प्रकृति ने अपना तांडव दिखाया है।
विध्वंशक रूप अपना कोरोना बन आया है।
--आनंद प्रमोद
22.3.2020