स्वंम को ही ढूंढता स्वंम से ही दूर हूँ।
अपने अन्तर में झाँक कर,
अनंत को ढूंढता हूँ।
अनंत में अनहद को ढूँढता हूँ
अन्तर में स्वंम स्वरूप को ढूँढता हूँ
पर कहीं कुछ भी नही ढूंढ पाता हूँ
अनंत में निहार कर
अन्धकार को पाता हूँ ।
अन्धकार से निकल कर ,
उज्जवल- दिव्य प्रकाश को ढूँढता हूँ
पर कहीं कुछ भी नहीं ढूंढ पाता हूँ
क्योंकि स्वंम को ही ढूँढता स्वंम से ही दूर हूँ।
Thursday, October 8, 2009
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what a poet it is very very good
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