मेरे प्रभु
हे विभु
हे करता
हे भरता
हे जगत नियंता
तुमने मुझसे न पूछा
न कुछ जांचा न परखा
और कर दिया पृथक
मुझे अपने से ।
नहीं..
नहीं है मुझे यह स्वीकार
मुझे तुमसे मिलना है
अहम् का बंधन तोड़ना है
तुम्हारी,
केवल तुम्हारीचेतना में डूबना है
कुछ ऐसा करो
मेरी नियति ऐसी रचो
की मैं डूबूं
और डूबता चला जाऊँ
तुम्हारी चेतना के अनंत महासागर में
एक क्षण को भी न उतलाऊं
बस केवल गहरे उतरता
चला जाऊँ
अनंत को छूने,
स्वयं को विलीन कर
तुम्हारी शरण,
केवल तुम्हारी शरण
में चला जाऊँ
छुट जाने दो मेरे हर मुखौटे
ध्वस्त हो जाने दो मेरे हर रिश्ते
जो बनाते हैं मुझे निर्बल हर पल
और
कराते हैं अहसास,
छोटे का
बड़ों का
घृणा का,
दुःख का,
दया का,
सुख का
मेरा पोर पोर मिलने को आतुर
मेरे कण कण
मिट जाने को आतुर
कुछ ऐसा कर दो
की मैं न रहूँ
बस तुम ही तुम रहो मुझमे
इस द्वैत की सत्ता को मिटा के,
अद्वैत कर,
मुझे तुम अपना लो
हे करता ,
हे धरता,
हे जगत नियंता,
मेरे प्रभु,
मेरे विभु ।
Wednesday, September 30, 2009
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