Sunday, April 26, 2020

पराभक्ति की स्थिति

पराभक्ति की परिभाषा को संत श्री सुंदर दास जी की वाणी से समझने का प्रयास किया..

श्रवण बिना धुनि सुनै, नयन बिनु रूप निहारै।
रसना बिन उच्चरै, प्रसंशा बहु विस्तारै।
नृत्य चरण बिनु करै, हस्त बिनु ताल बजावै।
अंग बिना मिली संग बहुत आनंद बढ़ावै।।
बिनु शीश नावै जहं सेव्य को सेवक भाव लिये रहै।
मिलि परमातम सों आतमा, परा भक्ति सुंदर कहै।

 ये वाणी संत श्री सुंदर दास जी महाराज की है।

यहाँ बहुत ही सार गर्भित बात स्पष्ट की गई है कि

"श्रवण बिन धुनि सुनै", अर्थात हमारे कान जो बाहरी आवाजों  के सुनने की क्षमता रखती है उससे उलट उससे अंतर व भीतर के ध्वनियों को सुनने के लिए सक्षम बनाईये। जिससे विभिन्न प्रकार के राग रागिनियों के धुन बिन वाद्य यंत्रों को सुन सकेंगे और आनन्द से आह्लादित हो सकेंगे। कहने का अर्थ है अंतस्थ होइए।

"नयन बिन रूप निहारे" कहने का अर्थ है आप आँख बंद कर अपने ईष्ट का या इस ब्रह्मांड के विभिन्न आयामों को देखिए, बाह्य दृष्टि को अंतर्दृष्टि में परिवर्तित कीजिए, अंतर्मुखी हो जाइए।

"रसना बिन उच्चरै, प्रसंशा बहु विस्तारै", कहने का अर्थ है विणा जिह्वा के ही संवाद स्थापित हो रही है व बहुत ही बिस्तार से प्रशंशा की जा रही है, अर्थात आप जिह्वा से ना बोल अपने अंतर्मन से ही मष्तिष्क में ही अपने इष्ट की प्रशंसा अर्थात नाम का सुमिरन कर रहें है उनके रूप को अंतर में ही निहार निहार बखान कर निहाल हो रहें है।

"नृत्य चरण बिनु करै, हस्त बिनु ताल बजावै" अर्थात आपके शरीर का अंग पैर और हाथ स्थिर किये हैं और आप नाच रहे है और ताली भी बजा रहें है मतलब आप हाथ पांव समेट कर ध्यान में बैठें है और आनंद से लबालब हो आपका सूक्ष्म शरीर नाच नाच कर ताली बजा बजा कर इष्ट संकीर्तन में शामिल है। अंतर में ही उर्ध्वगामी हो रहें हैं।

"अंग बिना मिली संग बहुत आनंद बढ़ावै" कहने का अर्थ है यह स्थूल शरीर का कोई काम नहीं, इस स्थूल शरीर के बिना ही सूक्ष्म शरीर से अपनेने इष्ट से मिल रहे है व आनंदित हो रहें है।

"बिनु शीश नावै जहं सेव्य को सेवक भाव लिये रहै" कहने का अर्थ है आपने भाव से ही प्रणाम किये दंडवत किये शरीर का अंग सिर झुकाने का कोई मायने नहीं मतलब ध्यान में सिर हिलाने व झुकाने का नहीं सिर्फ इष्ट व सेवक का भाव रखिए अपने अंतस में, अपने मन में, सजग रह कर, सहज भाव से , चेतना जगाये रहिये अपने इष्ट के प्रति।

"मिलि परमातम सों आतमा, परा भक्ति सुंदर कहै" यह इस वाणी का सार है इसका मतलब है ऊपर की भांति जब भक्ति करेंगें तो अपनी आत्मा परमात्मा से मिली रहेगी, इसी भक्ति का नाम परा भक्ति है। आत्मा को परमात्मा से मिलाने का यही एक रास्ता है। ध्यानस्थ हो कर अंतर्मुखी हो अंतस्थ होइए। बाहर की भक्ति से कुछ भी हासिल नही होगा। परा भक्ति ही एकमात्र साधन है परमात्मा से मिलने का। यही संत श्री सुंदर दास जी इस वाणी के माध्यम से हम जीव को बता रहें हैं।
      --- आनंद प्रमोद 20.04.2020

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