कवि व संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसी दास जी का कथन है कि
"ईश्वर अंश जीव अविनाशी,
चेतन अमल सहज सुख राशि।"
अर्थात यह जीव माने हम जीव का नाश नहीं होता, क्योंकि हम जीव ईश्वर के अंश है। ईश्वर के अंश होने के कारण हम परम आनंद को पाने के अधिकारी हैं, अपनी चेतना को उस दिव्य स्तर तक पहुंचने के अधिकारी हम हीं हैं वहां तो विशुद्ध प्रेम, सुख, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और शांति है, उसी विशिष्ट गुण से हम परिपूर्ण हो जातें है। तब सम्पूर्ण प्रकृति भी हमारे लिये सुखदायी हो जाती है। इस स्थिति को केवल अनुभव किया जा सकता है यह स्थूल नहीं है अति सूक्ष्म है परम की अनुभूति अंतर को अंतस को अनंत सुख से ओतप्रोत कर देती है।
पर इस परम स्थिति तक ले जाने के लिए एक देहधारी सद्गुरु की आवश्यकता होती है क्योंकि कहा है "बिन गुरु होहिं ना ज्ञान" फिर तो परम तक ले जाने वाला कोई सदगुरु ही हो सकता है। सद्गुरु सम भाव से उस सच्चिदानंद की शरण में जाने की विधि वही सिखाते हैं। हम देह नहीं हैं, देही हैं, जिसे शास्त्रों में जीव कहते हैं। जीव परमात्मा का अंश है, उसके लक्षण भी वही हैं जो परमात्मा के हैं। वह भी शाश्वत, चेतन तथा आनन्दस्वरूप है। सद्गुरु और ईश्वर को भूलें नहीं ...सद्गुरु के बताए मार्ग पर चल कर ईश्वरीय सुख के अधिकारी बनें।
🙏🌹जय गुरु महाराज🌹🙏
"ईश्वर अंश जीव अविनाशी,
चेतन अमल सहज सुख राशि।"
अर्थात यह जीव माने हम जीव का नाश नहीं होता, क्योंकि हम जीव ईश्वर के अंश है। ईश्वर के अंश होने के कारण हम परम आनंद को पाने के अधिकारी हैं, अपनी चेतना को उस दिव्य स्तर तक पहुंचने के अधिकारी हम हीं हैं वहां तो विशुद्ध प्रेम, सुख, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और शांति है, उसी विशिष्ट गुण से हम परिपूर्ण हो जातें है। तब सम्पूर्ण प्रकृति भी हमारे लिये सुखदायी हो जाती है। इस स्थिति को केवल अनुभव किया जा सकता है यह स्थूल नहीं है अति सूक्ष्म है परम की अनुभूति अंतर को अंतस को अनंत सुख से ओतप्रोत कर देती है।
पर इस परम स्थिति तक ले जाने के लिए एक देहधारी सद्गुरु की आवश्यकता होती है क्योंकि कहा है "बिन गुरु होहिं ना ज्ञान" फिर तो परम तक ले जाने वाला कोई सदगुरु ही हो सकता है। सद्गुरु सम भाव से उस सच्चिदानंद की शरण में जाने की विधि वही सिखाते हैं। हम देह नहीं हैं, देही हैं, जिसे शास्त्रों में जीव कहते हैं। जीव परमात्मा का अंश है, उसके लक्षण भी वही हैं जो परमात्मा के हैं। वह भी शाश्वत, चेतन तथा आनन्दस्वरूप है। सद्गुरु और ईश्वर को भूलें नहीं ...सद्गुरु के बताए मार्ग पर चल कर ईश्वरीय सुख के अधिकारी बनें।
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