छठ पूजा प्रकृति पूजा है, इसमें न पंडित, न मंत्र सिर्फ अपनी मानशिक शारीरिक संलग्नता से प्रकृति की सबसे शक्तिशाली आदित्य को जो जगत को प्रकाशित कर रहा है अनवरत ऊर्जा का संचार कर रहा है जो नित्य सदैव दीप्त है उसका ध्यान करना और सम्मान पूर्वक जाते व आते दोनों वक्त अर्घ्य देना और अपने अंदर भी इसी प्रकार से सब प्रकाशित होते रहे, छठ ब्रती के रूप में ये अनोखा अनुभव सदैव यादगार रहेगा।
न ढकोसला न वितण्डा
न पाखंड न पंडित
न मंत्र न तंत्र,
न कोई विधि न विधान
बस केवल सहज व सरल
तरीके से प्रकृति का सम्मान।
सभी जाति के लोग एक ही घाट पर अस्तगामी व ऊर्ध्वगामी दिनकर को अर्ध्य देना सामाजिक स्तर पर सौहार्दपूर्ण सहभागिता का जीता जागता उदाहण है छठ पर्व।
प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं को स्वच्छता पूर्वक उपयोग करने की कला व उसको सही तरीके से प्रयोग कर सम्मान देना ही सही मायने में छठ पूजा है।
ना जानू विधि, पर करती सम्मान
जाहे विधि तू कराए, वहे विधि अर्घ्य चढ़ाए हो तूम,
यही होना चाहिए भी।
न ढकोसला न वितण्डा
न पाखंड न पंडित
न मंत्र न तंत्र,
न कोई विधि न विधान
बस केवल सहज व सरल
तरीके से प्रकृति का सम्मान।
सभी जाति के लोग एक ही घाट पर अस्तगामी व ऊर्ध्वगामी दिनकर को अर्ध्य देना सामाजिक स्तर पर सौहार्दपूर्ण सहभागिता का जीता जागता उदाहण है छठ पर्व।
प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं को स्वच्छता पूर्वक उपयोग करने की कला व उसको सही तरीके से प्रयोग कर सम्मान देना ही सही मायने में छठ पूजा है।
ना जानू विधि, पर करती सम्मान
जाहे विधि तू कराए, वहे विधि अर्घ्य चढ़ाए हो तूम,
यही होना चाहिए भी।

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